मृत्यु भोज अब बस! समाज सुधार की दिशा में मारवाड़ी युवा मंच की अभिनव पहल, पत्रकार चंद्र प्रकाश शर्मा ने रखी नजीर

थर्ड आई न्यूज

गुवाहाटी I मारवाड़ी युवा मंच के समाज सुधार अभियान के तहत मंच की गुवाहाटी शाखा विभिन्न मुद्दों पर काम कर रही है। पूर्वोत्तर में मंच दर्शन के इस अहम सामाजिक आयाम की शुरुआत करते हुए कल शाखा की तरफ से मृत्युभोज उन्मूलन कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। इस संबंध में शाखा अध्यक्ष मोहित मालू ने बताया कि मंच के समाज सुधार अभियान की कई कडिय़ां है, जो समय-समय पर वर्तमान सामाजिक परिदृश्य में काफी प्रासंगिक साबित हुई है। इनमें दहेज प्रथा उन्मूलन, विधवा विवाह, संयुक्त परिवारों में विघटन को रोकना सहित तमाम पहलू शामिल है। इसी कड़ी में शाखा कल ‘मृत्युभोज अब बस!’ शीर्षक से नये अभियान की शुरुआत कर रही है। उल्लेखनीय है कि वरिष्ठ पत्रकार और मंच के पोषक सदस्य चंद्रप्रकाश शर्मा अपनी माता के निधन पर उपाध्यक्ष मितेश सुराना के सुझाव पर इस पहल के लिए सामने आए है। मंच की गुवाहाटी शाखा ने कल शाम शर्मा की सहमति एवं मितेश सुराना के सुझाव पर इस बाबत एक बैठक में निर्णय लिया। इस मौके पर उपाध्यक्ष मितेश सुराना, मंत्री सूरज जैन, कोषाध्यक्ष अनूप शर्मा, कार्यक्रम संयोजक आकाश शर्मा सहित कई शाखा सदस्य मौजूद थे। अध्यक्ष मोहित मालू ने बताया कि कल शर्मा की माता के द्वादशा के अवसर पर सभी रीति नियम पारंपरिक पद्धति से संपन्न किये जायेंगे। लेकिन शास्त्रों से परे मृत्युभोज की अवधारणा से किनारा किया जाएगा। शाखाध्यक्ष मालू ने कहा कि मृत्यु और भोज अपने आप में विरोधाभास का सूचक है। इस कुरीति पर सामाजिक और सरकारी स्तर पर कई चर्चाएं हुई। राजस्थान सरकार ने तो बाकायदा मृत्यभोज निवारण अधिनियम 1960 तक पारित किया। लेकिन इसे पूरी तरह निर्मूल करने में सफलता नही मिली। कोरोना परिस्थितियों में लॉकडाउन के दौरान प्रशासनिक कड़ाई से इस पर अंकुश लगता दिखा। वहीं अब लोग भी इसकी प्रासंगिकता को लेकर नये सिरे से विचार करने की आवश्यकता जताते नजर आ रहे है। मंच दर्शन के पांच सूत्रों में पहले से समाहित इसके निर्मूल अभियान को अब निर्णायक गति देने का समय आ गया है। मालू ने नेक अभियान की शुरुआत के लिए चंद्रप्रकाश शर्मा को आगे बढऩे के लिए उनका आभार व्यक्त किया। वहीं कुरीति के खिलाफ बिगुल फूंकने के अगुआ बने पत्रकार चंद्रप्रकाश शर्मा ने कहा कि मंच उनके रक्त में बहता है और ऐसे में वे इसके दर्शन से सदैव प्रभावित रहे हैं। उन्होंने कहा कि मृत्युभोज दु:ख का भोज है खुशी का नहीं। यह शरीर को भी कष्ट देता है। व्यक्ति की मृत्यु पर शास्त्र वर्णित नियमों का अनुपालन जरूरी है। यह हमारी परंपरा और विरासत के साथ ही हिंदू धर्म की वैज्ञानिकता को प्रदर्शित करती है। लेकिन मौत पर भोज का यह पाखंड बंद होना चाहिए। उन्होंने कहा कि बजाय इसके जरूरतमंदों को मृतक की स्मृति में भोजन, वस्त्र प्रदान करने के साथ ही अन्य जरूरतों को पूरा किया जा सकता है। उन्होंने आत्मिक संतुष्टि के लिए कुछ और वैकल्पिक उपायों की बात कही जो प्रासंगिक हो। मृत्युभोज पर लगाम लगाने के लिए समाज के हर घटक से आगे आने का आह्वान शर्मा ने किया।

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