नगांव:प्यासे शहर में प्याऊ तो लगे हैं, पर किसी में नहीं है टोटी, तो कोई मरम्मत के अभाव में पड़ा हैं खराब

थर्ड आई न्यूज

नगांव I चौमासे की भीषण गर्मी और चिलचिलाती धूप में राहगीरों का गला तर करने के लिए शहर के अनेक इलाकों में सामाजिक संस्थाओं और दानदाताओं द्वारा लगाए गए ठंडे जल के प्याऊ खुद ही प्यासे हैं। स्थिति यह है कि शहर के किसी भी सार्वजनिक प्याऊ में पानी नहीं है। इससे इनकी सार्थकता खत्म हो रही हैं । ऐसे में लोगों को अपनी प्यास बुझाने के लिए सड़कों पर बिकने वाले पेय और पेयजल का सहारा लेना पड़ रहा है। गौरतलब है कि मीडिया में बने रहने के लिए सामाजिक संस्थाओं द्वारा स्थायी तथा अस्थायी प्याऊ लगाए जाते हैं I अखबारों की सुर्खियों में अपने चेहरों को चमकाकर समाज सेवा के नाम पर लगाए गए ये प्याऊ कुछ दिन तो काम करते हैं, फिर रखरखाव के अभाव में इन्हें अपनी बेबसी पर रोते देखा जा सकता है I समाज सेवा के नाम पर समाज बंधुओं के दान के पैसे से शुरू किए गए इन प्रकल्पों से उल्टे समाज की बदनामी होती देखी गई है I

उल्लेखनीय है कि शहर के माजरआटी चाराली स्थित श्री गोपाल गौशाला प्याऊ,श्री कृष्णाश्रम शिव मंदिर स्थित प्याऊ,लायंस क्लब नगांव द्वारा जिला उपायुक्त कार्यालय परिषर में स्वर्गीय घीसालाल रुठिया की स्मृति में बना प्याऊ,हैबरगांव बाजार के मध्य में सन 2009 में स्वर्गीय नवरंग राय बंका की पुण्य स्मृति में बना प्याऊ, जिसका उद्धघाटन पूर्व वन और पर्यटन मंत्री रोकिबुल हुसैन द्वारा किया गया था,अब खुद पानी को तरसते नजर आ रहें है। ये शहर के वो प्याऊ है जो सार्वजनिक स्थानों पर खुले थे और कुछ दिनों तक ही लोगों व राहगीरों की प्यास बुझा सके I अब इन प्याऊ की टंकियों में न तो पानी रहता है और न ही इनकी देखभाल होती है I कुछ प्याऊ तकनीकी दोषों के चलते ठप हैं तो कुछ में टोटियां तक नहीं हैं।जल और समय का महत्त्व बस उन्हें ही पता चलता है, जिनके पास इनकी कमी होती है और ये अहसास तब और गहरा हो जाता है जब मई-जून-जुलाई की उमस भरी भीषण गर्मी में आपको पानी की दो बूंद मिल जाएं तो आप तर हो जाएं।स्थानीय लोगो ने बताया कि इन प्याऊ की बदहाली के लिए कुछ हद तक जनता भी जिम्मेदार है।स्थानीय नागरिक बताते हैं कि कुछ प्याऊ चोरों के हत्थे चढ़ गए जो प्याऊ के नल की टोंटी तक लोग खोलकर ले गए। जो बच भी गए हैं, वो बेहद जर्जर हालत में हैं, जिनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है। स्थानीय नागरिक बताते हैं कि इन प्याऊ के रख-रखाव की जिम्मेदारी कुछ समय के लिए निजी संस्थाओं ने ली थी, लेकिन जैसे-जैसे समय बढ़ता गया, उन्होंने अपने हाथ खींच लिए I बहरहाल, शहर में कहीं भी प्याऊ की व्यवस्था ना होने से राहगीरों के हलक सूख रहे हैं।

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