Kashmiri Pandits: पंडितों की कश्मीर वापसी रोकने, गैर मुस्लिमों में खौफ पैदा करने की साजिश

गैर मुस्लिमों और कश्मीरी पंडितों के लिए कश्मीर हालात सिर्फ देखने के लिए ठीक हैं।
कश्मीर में अराजक तत्व गैर कश्मीरियों को कश्मीरी पंडितों मुख्यधारा की राजनीति में शामिल कश्मीरी मुस्लिमों को और भारत का नारा लगाने वाले मुस्लिमों को भारतीय एजेंट करार देते हैं उन्हेंं इस्लाम का दुश्मन कहते हैं। राकेश पंडिता की हत्या उसी मानसिकता की द्योतक है।

 कश्मीर में सक्रिय जिहादी तत्वों के हाथों शहीद होने वालों की सूची में राकेश पंडित का नाम भी शामिल हो गया है। उन्होंने आतंकियों की धमकियों की परवाह किए बिना नगर निकाय का चुनाव लड़ा था। इसलिए उनकी हत्या को कश्मीर में लोकतंत्र की बहाली या फिर अमन बहाली के दुश्मनों की करतूत कहा जाएगा, लेकिन यह हत्या सिर्फ लोकतंत्र को नुकसान पहुंचाने के लिए नहीं है, यह घाटी में वापसी के लिए कदम बढ़ा रहे कश्मीरी पंडितों को रोकने की साजिश का एक बड़ा हिस्सा है। यह हत्या गत दिसंबर से घाटी में कश्मीरी पंडितों की वापसी के लिए केंद्र सरकार व उपराज्यपाल मनोज सिन्हा द्वारा तैयार की जा रही योजना पर कार्यान्वयन शुरू होने से पहले ही उसे पटरी से उतारने का कारण बन सकती है।

आतंकियों ने गत बुधवार को त्राल में भाजपा नेता व म्युनिसिपल कमेटी के चेयरमैन राकेश पंडित की हत्या कर दी थी। वीरवार को जम्मू में उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया। उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने 25 दिसंबर 2020 को जम्मू में कहा था कि विस्थापित कश्मीरी पंडितों की घाटी वापसी और पुनर्वास की एक व्यावहारिक कार्ययोजना विचाराधीन है और जल्द ही इस पर काम होगा। हालांकि उन्होंने यह नहीं बताया था कि इसे कब लागू किया जाएगा, लेकिन यह माना जा रहा था कि मौजूदा र्गिमयों में ही इसे लागू किया जाएगा। इसलिए हत्या की टाइमिंग बहुत कुछ कहती है।

गैर मुस्लिमों में खौफ पैदा करने की साजिश : राकेश पंडित की हत्या तीन जून को हुई है। पिछले साल भी जून माह के दौरान ही दक्षिण कश्मीर में सरपंच अजय पंडित को आतंकियों ने मौत के घात उतार दिया था। इसके अलावा गत रोज ही पाकिस्तान और भारत के बीच सीमा पर संघर्ष विराम की दोबारा बहाली के 100 दिन पूरे हुए हैं और थलसेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे भी कश्मीर में ही थे। इसके अलावा कश्मीर के एक मशहूर ढाबा मालिक के पुत्र आकाश मेहरा की हत्या को भी करीब 108 दिन हुए थे। बीते एक साल के दौरान करीब एक दर्जन भाजपा कार्यकता, सरपंच और काउंसलर आतंकियों के हाथों मारे गए हैं, लेकिन आकाश व राकेश पंडित की इस साल हुई हत्याएं किसी न किसी तरीके से सिर्फ एक ही साजिश की तरफ इशारा करती हैं और वह कश्मीर से गैर मुस्लिमों और अल्पसंख्यकों को भगाने के लिए उनमे खौफ पैदा करना।

हालात सिर्फ देखने के लिए ही ठीक : टीआरएफ, पीएएफएफ, लश्कर-ए-मुस्तफा, गजनवी फोर्स जैसे कुछ नए आतंकी संगठन जो बीते दो सालों के दौरान सामने आए हैं, वह खुलेआम कश्मीर में गैर कश्मीरियों और गैर मुस्लिमों के नाम अक्सर फरमान जारी कर रहे हैं। वह एक बार नहीं कई बार कह चुके हैं कि कश्मीर में गैर मुस्लिमों को बसाने की किसी भी कोशिश को कामयाब नहीं होने दिया जाएगा। कश्मीर में सामान्य नजर आने वाले हालात में अल्पसंख्यकों की स्थिति क्या है, इसका जिक्र राकेश पंडित की पत्नी ने भी किया है। उन्होंने कहा है कि अक्सर त्राल में कई लोग दबे मुंह कहते थे कि यहां क्या लेन आए हो। यहां क्या करना है। मतलब साफ है कि गैर मुस्लिमों और कश्मीरी पंडितों के लिए कश्मीर हालात सिर्फ देखने के लिए ठीक हैं, जमीनी स्तर पर 1990 की स्थिति से ज्यादा अलग नहीं हैं।

कश्मीरी पंडितों के घाटी में बढ़ते कदमों से कुछ तत्व हताश : कश्मीर में अराजक तत्व गैर कश्मीरियों को, कश्मीरी पंडितों, मुख्यधारा की राजनीति में शामिल कश्मीरी मुस्लिमों को और भारत का नारा लगाने वाले मुस्लिमों को भारतीय एजेंट करार देते हैं, उन्हेंं इस्लाम का दुश्मन कहते हैं। राकेश पंडिता की हत्या उसी मानसिकता की द्योतक है। आतंकियों ने उसे सिर्फ एक राजनीतिक कार्यकर्ता होने के कारण नहीं बल्कि उस वर्ग का प्रतिनिधि होने के कारण भी मौत के घाट उतारा है, जिसे 1990 के दौरान खदेड़कर जिहादी तत्वों को लगा था कि कश्मीर में निजाम-ए-मुस्तफा और आजादी का लक्ष्य हासिल किया गया है।

केंद्र सरकार हत्या के पीछे की साजिश समझे : कश्मीर मामलों के जानकार डा. अजय चरुंगु ने कहा कि राकेश कुमार की हत्या का मकसद सिर्फ और सिर्फ कश्मीर में अल्पसंख्यकों को डराना, गैर कश्मीरियों को कश्मीर में बसने से रोकना और कश्मीरी पंडितों की कश्मीर वापसी की प्रक्रिया को शुरू होने से पहले ही पटरी से नीचे उतारना है। केंद्र सरकार को इसे समझना चाहिए। वह इसे महज आतंकवाद या कानून व्यवस्था का मुद्दा न समझे, बल्कि इसके पीछे की धर्मांध जिहादी मानसिकता को समझे। 

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