असम में एनआरसी को पूरे हुए 3 साल, नागरिकता को लेकर संशय बरकरार

थर्ड आई न्यूज

गुवाहाटी I असम में 31 अगस्त, 2019 को जारी हुई एनआरसी में 19 लाख से ज्यादा लोगों के नाम शामिल नहीं थे, जिससे उनकी नागरिकता को लेकर संशय पैदा हो गया है. प्रदेश में कुल 3,30,27,66 लोगों ने आवेदन किया था, जिनमें से 3,11,21,004 का नाम एनआरसी में शामिल हैं.

असम में उन लोगों के बीच संशय की स्थिति बनी हुई है, जिनके नाम राज्य में तीन साल पहले प्रकाशित हुई एनआरसी में नहीं थे. असम में 31 अगस्त, 2019 को जारी अंतिम एनआरसी में 19,06,657 लोगों के नाम शामिल नहीं थे, जिससे उनकी नागरिकता को लेकर संशय पैदा हो गया है.

मालूम हो कि कुल 3,30,27,661 आवेदकों में से 3,11,21,004 लोगों के नाम शामिल थे.

कई लोग कर चुके हैं आत्महत्या :
नागरिकता के मुद्दों से जूझ रहे लोगों के लिए लड़ने वाले एक कार्यकर्ता अशरफुल हुसैन ने कहा कि एनआरसी मामले को हल करने में अत्यधिक देरी से निहित स्वार्थों वाले एक वर्ग को समाज को अस्थिर करने और अशांति पैदा करने में मदद मिल रही है. उन्होंने कहा कि हमारे अनुमान के अनुसार पिछले 15-20 वर्षों में कम से कम 81 लोगों ने अपनी नागरिकता को लेकर जारी संशय के कारण आत्महत्या की है. कई लोगों को तकनीकी आधार पर बाहर कर दिया गया था और इसे ठीक करने के लिए कुछ भी नहीं किया गया. इस मुद्दे पर काम कर रहे एक गैर सरकारी संगठन सोशल जस्टिस फोरम (एसजेएफ) ने सरकार से राज्य में शांति के स्थायी माहौल के लिए मामले को सुलझाने की मांग की.

पी चिदंबरम ने की है मदद की पेशकश :
पूर्व केंद्रीय मंत्री और वरिष्ठ अधिवक्ता पी चिदंबरम ने नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में असम प्रदेश कांग्रेस कमेटी (एपीसीसी) द्वारा दर्ज मामले में सहायता की पेशकश की है. पार्टी के एक प्रवक्ता ने बुधवार को यहां यह जानकारी दी. पार्टी प्रवक्ता ने कहा कि एपीसीसी ने शीर्ष अदालत के समक्ष अपने मामले को आगे बढ़ाने के लिए दिल्ली के एक बड़े लॉ प्रतिष्ठान से भी बातचीत शुरू कर दी है. एपीसीसी के मुख्य प्रवक्ता मंजीत महंत ने कहा कि हमारे वरिष्ठ नेता, वरिष्ठ वकील और पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम ने उच्चतम न्यायालय में सीएए के खिलाफ हमारे मामले में हरसंभव मदद की पेशकश की है. उन्होंने कहा कि अगर जरूरत पड़ी तो वह शीर्ष अदालत में दलीलों के स्तर पर भी सहायता करेंगे. एपीसीसी ने 2019 में सीएए के खिलाफ उच्चतम न्यायालय का रुख किया था.

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