असम के वयोवृद्ध शिल्पकार नील पवन बरुआ नहीं रहे, मुख्यमंत्री ने जताया शोक

थर्ड आई न्यूज

गुवाहाटी । असम से शुक्रवार को एक और बुरी खबर आई। केवल असम के ही नहीं बल्कि पूरे पूर्वोत्तर के सबसे वयोवृद्ध और असम सौरभ पुरस्कार से पुरस्कृत नील पवन बरुआ का शुक्रवार को यहां दोपहर बाद निधन हो गया। वे 86 वर्ष के थे। इससे पूरे कला जगत में शोक का लहर है। बरुआ के भाई डॉ. सुनील पवन बरुआ ने यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि 21 सितंबर से ही उनकी तबीयत ठीक नहीं थी, उनका इलाज चल रहा था। पिछले कुछ दिनों से उनको आईसीयू में भर्ती कराया गया था। शुक्रवार शाम करीब 3.15 बजे उनका देहांत हो गया। उन्होंने बताया कि कल उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा। अमस के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने उनके निधन पर दुख जाताया। केंद्रीय मंत्री सर्वानंद सोनोवाल ने भी बरुआ ने निधन पर शोक जताया है।

1936 में ऊपरी असम के जोरहाट जिले के टियोक में जन्मे पवन बरुआ ने पूर्वोत्तर में कला को बढ़ावा देने के लिए अपना जीवन लगा दिया। उन्होंने माचिस के डिब्बों और सिगरेट के डिब्बों में कला को उकेरा, जो अपने आप में नया प्रयोग था। प्रसिद्ध गायिका पद्मश्री दीपाली बरठाकुर के साथ 1976 में उनकी शादी हुई थी।

उनके निधन पर असम के मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा ने ट्वीट करते हुए लिखा, यशस्वी शिल्पी, असम सौरभ पुरस्कार से पुरस्कृत नील पवन बरूआ के निधन की खबर सुनकर आहत हूं। पिछले कई दशकों से कला के लिए जिन्होंने अपना जीवन समर्पित कर दिया था। ऐसे व्यक्तित्व का जाना एक अपूरणीय क्षति है। उनके प्रशंसकों और परिजनों के प्रति गहरी संवेदनाएं व्यक्त करता हूं।

केंद्रीय मंत्री सर्वानंद सोनोवाल ने भी नील पवन बरूआ के निधन पर शोक जताते हुए कहा, उन्होंने असम के चित्रकला जगत को नए रास्ते दिखाए। रंग और तूलिका से नए रंग भरने वाले बरुआ ने अपने व्यक्तिगत प्रेम से हम सबको मुग्ध किया।उनके निधन की खबर सुनकर आहत हूं। उनके परिजनों को संवेदनाएं व्यक्त करता हूं। नील पवन बरूआ ने शुरुआती शिक्षा गृह जिला जोरहाट में पाई। इसके बाद उन्होंने गुवाहाटी में शिक्षा लेने के बाद 1960 में वे कला की शिक्षा लेने के लिए कोलकाता शांति निकेतन चले गए थे। यहां पर उन्हें प्रसिद्ध शिल्पी राम किंकर, नंदलाल और विनोद बिहारी का सानिध्य मिला।

पढ़ाई समाप्त करने के बाद 1968 में वे असम लौट आए थे। यहीं रहकर कला की सेवा करना चाहते थे। कुछ समय तक उन्होंने गवर्नमेंट आर्ट स्कूल, गुवाहाटी में बतौर प्राध्यापक की नौकरी की। कुछ समय बाद ही मन नहीं लगने पर उन्होंने 1969 को इस्तीफा दे दिया। नील पवन बरुआ ने असम में कला को बढ़ावा देने के लिए कई संगठन बनाए। उनका घर खुद एक कला का केंद्र रहा है। पूर्वोत्तर के हजारों शिल्पकारों को उन्होंने कूची पकड़ना सिखाया।

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