सिग्नेचर इस्टेट :कटघरे में भगवान, मंदिर को लेकर हंगामा क्यों है बरपा!

थर्ड आई न्यूज़, गुवाहाटी: मंदिर किसी कीमत पर बनने नहीं देंगे, हम मंदिर बनाकर रहेंगे, दो पक्षों की इस कशमकश में भगवान को कटघरे में खड़ा होना पड़ा. आस्था पर सबूत भारी पड़े. मंदिर निर्माण पर स्टे यानी इंजंक्शन आ गया और महानगर के पॉश सिग्नेचर इस्टेट में हंगामा खड़ा हो गया. यहां के 133 फ्लैट में रहने वाले लोगों के बीच धर्म के आधार पर विभाजन रेखा खींच गई. मामला सनातनी बनाम गैर सनातनी हो गया. यहां तक की अपार्टमेंट की व्यवस्था संभालने वाले सिग्नेचर इस्टेट वेलफेयर एसोसिएशन में भी इस अति संवेदनशील मुद्दे पर दरारें दिखाई पड़ने लगी. कहते हैं बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी. लिहाजा मंदिर पर हंगामे की बात भी सिग्नेचर इस्टेट की चहारदीवारी से बाहर निकली और देखते ही देखते टॉक ऑफ़ द टाउन बन गई.

लोगों में उत्सुकता जगी कि आखिर वे कौन सी ताकतें हैं, जिन्हें मंदिर निर्माण से परहेज हैं, वैर है. तहकीकात करने पर पता चला कि सिग्नेचर इस्टेट के बिल्डर ने वहां के फ्लैट मालिकों को मंदिर बना कर देने का वायदा किया था, पर किन्ही कारणों से वह पूरा नहीं हो पाया. इसके बाद अपार्टमेंट के मेंटेनेंस के लिए सिग्नेचर इस्टेट वेलफेयर एसोसिएशन बना, जिसकी सभाओं में मंदिर निर्माण की बात उठती रही. पर जब- जब यह बात उठती, तो फ्लैट ओनर्स का एक वर्ग सक्रिय हो जाता. कभी वह कहता कि मंदिर निर्माण का मुद्दा एजेंडे में नहीं है, तो कभी कोई और तकनीकी पेच फंसा देता. कभी कहा जाता कि प्रस्तावित मंदिर का निर्माण सर्वसम्मति से होगा. अंत में वहां के फ्लैट मालिक संतोष बंका, विजय सिंह डागा, राजेश सुराना और सुपारसमल बेद की अगुवाई में एक कमेटी बनी. और बात सर्वसम्मति से आम सहमति पर आ टिकी. तब लगने लगा था कि अब मंदिर निर्माण की राह की सारी विघ्न- बाधाएं दूर हो जाएंगी. पर नियति को शायद यह गवारा नहीं था. इस बीच कुछ लोगों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया. इंसाफ की देवी की आंख पर काली पट्टी होती है. लिहाजा न्याय के मंदिर ने भगवान के मंदिर पर स्टे दे दिया. संभवतः आस्था पर सबूत भारी पड़े.

अदालत के फैसले के बाद सिग्नेचर इस्टेट में सांप्रदायिक व सामुदायिक विभाजन की रेखा और गहरी हो गई. इस विषय में स्टे लाने वाले वकील से बात करने पर उन्होंने बताया कि इस सारे मामले का सांप्रदायिकता से कोई लेना – देना नहीं है. उन्होंने कहा कि अपार्टमेंट की कमेटी का काम केवल मैनेज करना है. उन्हें किसी भी प्रकार के नए कंस्ट्रक्शन की कोई इजाजत नहीं है. यहां तक कि उनकी सेल डीड में भी इस तरह का कोई प्रावधान नहीं है. इसके अलावा किसी भी तरह के निर्माण के लिए जीएमसी और जीएमडीए से इजाजत लेनी पड़ती है. जानकार वकील ने बताया कि इतना ही नहीं, सोसाइटी में नए निर्माण के लिए, चाहे वह मंदिर का ही क्यों ना हो, लैंडलॉर्ड की एनओसी की भी जरूरत पड़ती है. वकील साहब ने तो अपनी बातें कानूनी एंगल से समझा दी, पर सिग्नेचर इस्टेट के आम लोगों को शायद यह हजम नहीं हो रही है. उनका सीधा सपाट सवाल है कि मंदिर निर्माण से किसी को क्या तकलीफ हो सकती है. आस्था से जुड़े मुद्दे अदालत क्यों ले जाए जाते हैं. सिग्नेचर इस्टेट के एक फ्लैट ओनर ने कहा कि अगर कुछ लोगों की पूजा पद्धति भिन्न है, तो जरूरी नहीं कि वे मंदिर में आए और भगवान के दर्शन करें. अपनी बात की पुष्टि में उन्होंने तर्क दिया कि सिग्नेचर इस्टेट में टेनिस कोर्ट बना हुआ है.133 फ्लैट ओनर्स में से बामुश्किल 15-20 लोग उस कोर्ट का इस्तेमाल करते हैं .पर इससे टेनिस कोर्ट गैरजरूरी नहीं हो जाता .उसी प्रकार अगर 133 घरों में से 10-20 घरों के लोगों को मंदिर से परहेज है ,तो मंदिर गैर जरूरी नहीं हो जाता.

बहरहाल, महानगर की इस पॉश कॉलोनी में मंदिर बने या ना बने, यह चर्चा- ए – आम है कि मंदिर को लेकर हंगामा क्यों है बरपा. लोग इस विषय में जानने को उत्सुक हैं. हम अपनी ओर से उनकी जानकारी को दुरुस्त करने का प्रयास करेंगे. बने रहिए थर्ड आई न्यूज़ के साथ.

जारी…..

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